• Dehradun
  • August 5, 2026
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देहरादून। हरिद्वार नगर निगम की विवादित भूमि खरीद का मामला अब उत्तराखंड के सबसे चर्चित प्रशासनिक विवादों में शामिल हो गया है। लगभग 54 करोड़ रुपये में खरीदी गई भूमि को लेकर उठे सवालों ने कई वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। एक वर्ष तक चली जांच के बाद सरकार ने कड़ी कार्रवाई करते हुए तत्कालीन नगर आयुक्त के विरुद्ध सेवा से बर्खास्तगी की संस्तुति तथा तत्कालीन जिलाधिकारी के खिलाफ मेजर पेनाल्टी की सिफारिश की है।

सितंबर 2024 में शुरू हुई थी भूमि खरीद प्रक्रिया

सितंबर 2024 में हरिद्वार नगर निगम ने कूड़ा निस्तारण परियोजना के लिए सराय क्षेत्र में भूमि खरीद की प्रक्रिया शुरू की थी। कुछ ही महीनों के भीतर भूमि का मूल्यांकन कराया गया, खरीद प्रस्ताव को मंजूरी दी गई और करोड़ों रुपये का भुगतान कर रजिस्ट्री भी संपन्न करा दी गई।

बाद में शिकायतें सामने आईं कि खरीदी गई भूमि का वास्तविक बाजार मूल्य काफी कम था तथा भूमि का चयन भी कई सवालों के घेरे में था। आरोप लगाए गए कि नगर निगम ने अनुपयुक्त भूमि को अत्यधिक कीमत पर खरीदा।

मुख्यमंत्री के निर्देश पर शुरू हुई जांच

मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami ने जांच के निर्देश दिए। प्रारंभिक जांच में अनियमितताओं के संकेत मिलने के बाद जून 2025 में दो आईएएस अधिकारियों समेत 12 अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। इसके बाद मामले की विस्तृत जांच विजिलेंस को सौंपी गई।

एक वर्ष तक चली विजिलेंस जांच

जून 2025 से जून 2026 तक विजिलेंस ने मामले की गहन जांच की। इस दौरान अधिकारियों के बैंक रिकॉर्ड, फाइल नोटिंग, मूल्यांकन रिपोर्ट, अनुमोदन प्रक्रिया तथा भुगतान संबंधी दस्तावेजों की जांच की गई।

19 जून 2026 को बड़ा फैसला

विजिलेंस जांच में अनियमितताओं की पुष्टि होने के बाद राज्य सरकार ने सख्त कदम उठाए।

  • तत्कालीन नगर आयुक्त वरुण चौधरी के विरुद्ध सेवा से बर्खास्तगी की संस्तुति की गई।
  • तत्कालीन जिलाधिकारी कर्मेंद्र सिंह के खिलाफ मेजर पेनाल्टी (गंभीर दंड) की सिफारिश की गई।
  • अन्य संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध भी विभागीय कार्रवाई के आदेश जारी किए गए।

किस अधिकारी की क्या भूमिका रही?

वरुण चौधरी (तत्कालीन नगर आयुक्त, हरिद्वार)

नगर निगम की ओर से भूमि खरीद प्रक्रिया के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी के रूप में उनकी भूमिका रही। भूमि चयन, मूल्य निर्धारण से जुड़े प्रस्तावों को आगे बढ़ाने तथा खरीद प्रक्रिया को अंतिम रूप देने में उनकी जिम्मेदारी बताई गई है। सरकार ने उनके खिलाफ सबसे कठोर कार्रवाई करते हुए सेवा से बर्खास्तगी की संस्तुति की है।

कर्मेंद्र सिंह (तत्कालीन जिलाधिकारी, हरिद्वार)

तत्कालीन जिलाधिकारी के रूप में भूमि खरीद से जुड़े राजस्व और प्रशासनिक अनुमोदनों की निगरानी उनके अधिकार क्षेत्र में थी। जांच में उनकी भूमिका को लेकर सरकार ने मेजर पेनाल्टी की सिफारिश की है।

कैसे पूरी हुई खरीद प्रक्रिया?

जांच के दौरान भूमि खरीद की पूरी प्रक्रिया पर भी सवाल उठे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार:

  1. भूमि खरीद का प्रारंभिक प्रस्ताव तैयार किया गया।
  2. राजस्व विभाग ने मूल्यांकन रिपोर्ट बनाई।
  3. नगर निगम ने भूमि खरीद का प्रस्ताव आगे बढ़ाया।
  4. फाइल नगर आयुक्त स्तर तक पहुंची।
  5. जिलाधिकारी स्तर पर प्रशासनिक अनुमोदन और प्रक्रियाएं पूरी की गईं।
  6. इसके बाद भुगतान और रजिस्ट्री की कार्रवाई संपन्न हुई।

जांच एजेंसियों का मुख्य आरोप

जांच एजेंसियों का आरोप है कि जिस भूमि को खरीदा गया वह डंपिंग यार्ड के निकट स्थित और परियोजना के लिए अनुपयुक्त थी। इसके बावजूद उसे लगभग 54 करोड़ रुपये की ऊंची कीमत पर खरीदा गया। इसी आधार पर नगर निगम और जिला प्रशासन के कई अधिकारियों की भूमिका जांच के दायरे में आई।

प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा मामला

हरिद्वार भूमि खरीद प्रकरण को राज्य के प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही और पारदर्शिता की कसौटी माना जा रहा है। एक वर्ष तक चली जांच के बाद हुई कार्रवाई ने स्पष्ट संकेत दिया है कि सरकारी धन के उपयोग में अनियमितता के मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।

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uttarakhandinsight18@gmail.com

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