गोसेवा और पर्यावरण संरक्षण के लिए जीवन समर्पित किया, ब्रज की पहाड़ियों में खनन के खिलाफ चलाया था आंदोलन; 2019 में मिला था पद्मश्री
मथुरा। ब्रज के विरक्त संत और पद्मश्री से सम्मानित रमेश बाबा जी महाराज का मंगलवार को निकुंज गमन हो गया। वह 88 वर्ष के थे। उन्होंने बरसाना स्थित मान मंदिर में इह लीला समाप्त ली। रमेश बाबा ने अपना पूरा जीवन गोसेवा और पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित किया।
रमेश बाबा का जन्म वर्ष 1938 में प्रयागराज में हुआ था। 1954 में 16 वर्ष की उम्र में वह बरसाना पहुंचे। यहां उन्होंने राधारानी मंदिर में मृदंग बजाया। बाद में उन्होंने बरसाना के ब्रह्मांचल पर्वत पर मान मंदिर आश्रम बनाया और ठाकुर मान बिहारी की सेवा में अपना जीवन लगा दिया।
पर्यावरण संरक्षण के लिए चलाया आंदोलन
रमेश बाबा ने गहवरवन में पेड़ों की कटाई के विरोध में अभियान चलाया। इसके साथ ही बरसाना से लेकर राजस्थान के पहाड़ी क्षेत्रों तक हो रहे अवैध खनन के खिलाफ भी उन्होंने आंदोलन किया।
उनके प्रयासों से ब्रज की पहाड़ियों के संरक्षण को लेकर आंदोलन को व्यापक समर्थन मिला। मूल खबर के अनुसार, वर्ष 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने ब्रज की पहाड़ियों में खनन पर रोक लगाने का आदेश दिया था।
माताजी गोशाला में हजारों गोवंश का संरक्षण
रमेश बाबा ने वर्ष 2007 में दो गोवंश के साथ माताजी गोशाला की शुरुआत की थी। खबर के अनुसार, आज इस गोशाला में हजारों गायों का संरक्षण किया जा रहा है और इसे एशिया की सबसे बड़ी गोशालाओं में शामिल बताया गया है।
गोसेवा और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए वर्ष 2019 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से विभूषित किया गया।
1968 में शुरू की ब्रज चौरासी कोस की यात्रा
रमेश बाबा ने वर्ष 1968 में ब्रजवासियों के साथ ब्रज चौरासी कोस की राधारानी ब्रजयात्रा शुरू की थी। खबर के अनुसार, अब हर वर्ष करीब 20 हजार श्रद्धालु इस निश्शुल्क ब्रजयात्रा में शामिल होते हैं। इनके रहने और भोजन की व्यवस्था मान मंदिर आश्रम की ओर से की जाती है।
प्रयागराज में हुआ था जन्म
रमेश बाबा का जन्म तीर्थराज प्रयाग में हुआ था। उनके पिता विख्यात ज्योतिषाचार्य बलदेव प्रसाद शुक्ल और माता हेमेश्वरी देवी थीं।
परिवार से जुड़ी जानकारी के अनुसार, उनके माता-पिता ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से रामेश्वरम में पुत्र कामेष्टि यज्ञ किया था। वर्ष 1938 में पौष मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को दोपहर 12 बजे उनका जन्म हुआ।
कहा जाता है कि उनके ज्योतिषाचार्य पिता ने जन्म के समय ही उनके बारे में भविष्यवाणी की थी कि यह बालक गृहस्थ जीवन नहीं अपनाएगा और ब्रह्मचारी रहेगा।
रमेश बाबा ने प्रारंभिक शिक्षा प्रयाग में प्राप्त की। आध्यात्मिक झुकाव के कारण उनका मन ब्रज की ओर आकर्षित होता रहा। उन्होंने दो बार जन्मभूमि छोड़कर ब्रज आने का प्रयास किया, लेकिन मां के स्नेह के कारण लौटना पड़ा। तीसरी बार वह सभी पारिवारिक बंधनों को पीछे छोड़कर ब्रजभूमि पहुंचने में सफल हुए।
कई धार्मिक स्थलों का कराया जीर्णोद्धार
रमेश बाबा के प्रयासों से ब्रज क्षेत्र के कई कुंडों और धार्मिक स्थलों के जीर्णोद्धार का कार्य हुआ। इनमें रत्न कुंड ढभाला, विह्वल कुंड संकेत, कृष्ण कुंड नंदगांव, बिछुवा कुंड बिछोर, गया कुंड कामां, लाल कुंड दुदावली, गोपाल कुंड डीग, रुद्र कुंड जतीपुरा, गोमती गंगा कोसी कलां, ललिता कुंड कमई, नयन सरोवर सेऊ, बिछुआ कुंड जतीपुरा, मेंहदला कुंड हताना, धमारी कुंड और लोहरवारी कुंड शामिल हैं।
रमेश बाबा का जीवन गोसेवा, ब्रज संरक्षण, पर्यावरण और धार्मिक स्थलों के संरक्षण के कार्यों के लिए जाना जाता रहा।



